Sunday, February 20, 2011
Friday, February 18, 2011
Thursday, February 17, 2011
छः
धधक रही जिस उर में ज्वाला
उसको खूब धधकने दो।
परिवर्तन की बात जो करता
उसको मन भर बकने दो॥
टकराते हैं हम नित प्याला
मदिरा खूब छलकने दो।
राजनीति की बात है भाई
रुको, रोटियाँ सिंकने दो॥
Wednesday, January 5, 2011
पाँच
कालिख में रहकर भी वे दूध के धुले हैं।
देखो भाई उनसे कोई क्वेश्चन न करनाजानते नहीं! वे क्षीरसागर से निकले हैं।।
Tuesday, January 4, 2011
चार
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| फोटो, साभार-गूगल |
कहा तक्षक ने, जनमेजय से,
क्यों व्यर्थ पड़े हो मेरे पीछे,
हम तो व्यर्थ ही बदनाम हैं।
चित्रगुप्त की लिस्ट में,
मुझसे पहले भी कई नाम हैं॥
Sunday, January 2, 2011
तीन
वे करते रहे वादा
उन्हें होता रहा फायदा।
पूरे साल गढ़ते रहे
नया-नया कायदा।।
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